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मसूरी को बी टू श्रेणी में लाने की मांग

देहरादून, 28 अक्तूबर (निस)। विश्व प्रसिद्ध पर्वतों की रानी मसूरी हिल स्टेशन को बीटू की श्रेणी में शामिल करने को लेकर उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी सम्मान परिषद के अध्यक्ष रवीन्द्र जुगरान ने गुरूवार को मुख्य सचिव से वार्ता कर उन्हें अपना मांग पत्र सौंपा। उन्होंने कहा कि एचआरए के लिए मसूरी सी श्रेणी का शहर […]
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देहरादून, 28 अक्तूबर (निस)। विश्व प्रसिद्ध पर्वतों की रानी मसूरी हिल स्टेशन को बीटू की श्रेणी में शामिल करने को लेकर उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी सम्मान परिषद के अध्यक्ष रवीन्द्र जुगरान ने गुरूवार को मुख्य सचिव से वार्ता कर उन्हें अपना मांग पत्र सौंपा। उन्होंने कहा कि एचआरए के लिए मसूरी सी श्रेणी का शहर है जबकि शआसकीय कार्यों के लिए अन्यत्र स्थानों से मसूरी आने वाले कर्मचारी अधिकारियों के डीए के लिए शासन द्वारा मसूरी को बी-2 की श्रेणी में ही रखा गया है। उच्चतम न्यायालय के वर्ष 1996 में आदेशानुसार समूरी नगर क्षेत्र में नये भवनों के निर्माण पर रोक पर पाबंदी लगे होने के कारण यहां आवासीय संकट गहरा गया है।
उन्होंने बताया कि 1999 में यूपी सरकार द्वारा 6 दिसंबर को मसूरी व नैनीताल को बिना किसी वैधानिक कारणों के ए श्रेणी से हटाकर सी श्रेणी में रख दिया गया था। 2000 में राज्य के अस्तित्व में आ जाने के बाद नैनीताल को तो बी टू की ही श्रेणी में शामिल किया गया जबकि मसूरी को सी श्रेणी में रखा गया। उन्होंने चिंता व्यक्त् करते हुए कहा कि मसूरी का स्तर व अस्तित्व ऊपर ुठने के बजाय लगातार नीचे गिरता जा रहा है। जो कि राज्य के लिए दुभा्रग्यपूर्ण है।
उन्होंने मसूरी के बारे में बताया कि अंग्रेजों द्वारा 1814 में स्थापित यह खूबसूरत शहर अविभाजित भारत का पहला हिल स्टेशन था। हिमालय का पहला अखबार मसूरी समाचार पत्र के नाम से ही निकला। पहला बिजली घर गलोगी पावर हाउस भी मसूरी में था। भारत का पहला फाइव स्टार होटल चार्लविल जो कि वर्तमान में लाल बहादुर शास्त्री आईएएस अकादमी में परिवर्तित हो गया मसूरी में ही थआ। सर्वे ऑफ इंडिया का मुख्यालय भी मसूरी में था। भारत में सर्वप्रथम मास्टर प्लान 1839 में मसूरी से ही प्रारंभ किया गया। उत्तर भारत का पहला छावनी क्षेत्र भी मसूरी में ही था। 1830 में मसूरी और लंढौर दो अलग शहर थे। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज मसूरी अपना असत्तिव बचाने के लिए संघर्ष कर रहै है।

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